दूर मुझ से हर ख़ुशी है आज कल।
गुम लबों से तो हंसी है आज कल।
मेरी बच्ची दूर मत जाना कहीं
अच्छे लोगों की कमी है आज कल।
हरजगह है ख़ौफ़ पसरा मौत का।
दहशतों में ज़िन्दगी है आज कल।
क़स्र शाही के इलावा,हरतरफ़
तीरगी ही तीरगी है आज कल।
रंजो ग़म ने उन को भी घेरा है क्या।
उन की आँखो में नमी है आज कल।
जाने"साहिर"कब समझ होगी
तुम्हें।
वक़्त कितना क़ीमती है आज कल।
✍ जितेंद्र कुमार साहिर