बातों -बातों में तुम गिला न करो
खत्म यादों का सिलसिला न करो
दुनियां सोचेगी जरूर क्या से क्या
चुपके -चुपके यूं तुम मिला न करो
गर भला भी किसी का कर न सको
तो किसी का कभी बुरा न करो
मैं मुकद्दर को आजमा रहा हूँ
मेरे हक़ मे कोई दुआ न करो
नाम उसका हमेशा ले लेकर
दिल के जख़्मों को अब हरा न करो
कौन अपना है कौन बेगाना
चंद लम्हों में फैसला न करो।
✍ जितेंद्र सुकुमार 'साहिर'
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