ग़ज़ल
कदम से कदम तुम मिलाओ तो जाने
मेरा साथ हरदम निभाओ तो जाने
सरल है दरख़्तों को यूं काट देना
कहीं पेड़ तुम भी लगाओ तो जाने
मुनासिब है माना खुशी में मचलना
जो हंस के हरेक ग़म उठाओ तो जाने
तुम्हारा इशारा ही काफी नहीं है
लबों पे कोई बात लाओ तो जाने
फ़कत मिलने का वादा करते हो तुम तो
हमें तुम कभी घर बुलाओ तो जाने
जो खुद को समझते हो शायर तो 'साहिर'
नया शेर कोई सुनाओ तो जाने
✍ जितेंद्र सुकुमार 'सहिर'
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