Monday, May 28, 2018

गजल

ग़ज़ल
              
कदम से कदम तुम मिलाओ तो जाने
मेरा साथ हरदम निभाओ तो जाने
               
सरल है दरख़्तों को यूं काट देना
कहीं पेड़ तुम भी लगाओ तो जाने
                 
मुनासिब है माना खुशी में मचलना
जो हंस के हरेक  ग़म उठाओ तो जाने
              
तुम्हारा इशारा ही काफी नहीं है
लबों पे कोई बात लाओ तो जाने
                 
फ़कत मिलने का वादा करते हो तुम तो
हमें तुम कभी घर बुलाओ तो जाने
              
जो खुद को समझते हो शायर तो 'साहिर'
नया शेर कोई सुनाओ तो जाने

✍ जितेंद्र सुकुमार 'सहिर'

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