Friday, June 1, 2018

ग़ज़ल

इसमें अब दो मत नहीं है
मेरे सर पर छत नहीं है

होश में रहता हूँ हरदम
मुझको कोई लत नहीं है

नाम लिक्खा है किसी का
यह तो मेरा ख़त नहीं है

वक़्त जब मुझको मिला है
तो तुम्हें फुर्सत नहीं है

सच कहे वो सबके आगे
इतनी भी हिम्मत नहीं है

पास अपने ग़म ही गम है
और कुछ दौलत नहीं है

✍जितेन्द्र सुकुमार  'साहिर'

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