इसमें अब दो मत नहीं है
मेरे सर पर छत नहीं है
होश में रहता हूँ हरदम
मुझको कोई लत नहीं है
नाम लिक्खा है किसी का
यह तो मेरा ख़त नहीं है
वक़्त जब मुझको मिला है
तो तुम्हें फुर्सत नहीं है
सच कहे वो सबके आगे
इतनी भी हिम्मत नहीं है
पास अपने ग़म ही गम है
और कुछ दौलत नहीं है
✍जितेन्द्र सुकुमार 'साहिर'
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