Sunday, April 7, 2019

ग़ज़ल

ग़ज़ल

हर एक जगह एक सा मंजर नहीं होता
बाहर है जो अक्सर यहां अंदर नहीं होता

क़ातिल कई ऐसे भी तो होते हैं जहां में
हाथों में वो जिनके कोई खंजर नहीं होता

मजबूत अगर होते कहीं रिश्ते दिलों के
तो आज मकां मेरा यूं खंडहर नहीं होता

क़ीमत जो समझता यदि  शबनम की जरा भी
तो प्यासा कभी कोई समंदर नहीं होता

जो हार के भी जीते हैं देखे हैं सिकंदर
बस जीतने वाला ही सिकंदर नहीं होता
✍ जितेंद्र सुकुमार ' साहिर '

ग़ज़ल

ग़ज़ल

कैसे गुजारा मैंने सफ़र तुमको इससे क्या ?
कांटो भरी है मेरी डगर तुमको इससे क्या ?

मुझसे तुम्हें न रब्त न निस्बत रही कोई
ज़िंदा रहूं या जाऊं मैं मर तुमको इससे  क्या ?

मफ़ऊलु , फा़इलात, मुफा़ईलु, फाइलुन
हम से जमे नहीं ये बहर तुमको इससे क्या ?

मतलब ना गुठलियों से रखो आम खाओ आप
किसने लगाया है ये शजर तुमको इससे क्या?

दुश्मन को भी गले से लगाया है बारह
फितरत है ऐसी मेरी अगर तुमको इससे क्या ?

जब दिल मे अापके मेरी खातिर जगह नहीं
भटका करूं मैं चाहे जिधर तुमको इससे क्या?

✍ जितेंद्र सुकुमार  ' साहिर '