ग़ज़ल
कैसे गुजारा मैंने सफ़र तुमको इससे क्या ?
कांटो भरी है मेरी डगर तुमको इससे क्या ?
मुझसे तुम्हें न रब्त न निस्बत रही कोई
ज़िंदा रहूं या जाऊं मैं मर तुमको इससे क्या ?
मफ़ऊलु , फा़इलात, मुफा़ईलु, फाइलुन
हम से जमे नहीं ये बहर तुमको इससे क्या ?
मतलब ना गुठलियों से रखो आम खाओ आप
किसने लगाया है ये शजर तुमको इससे क्या?
दुश्मन को भी गले से लगाया है बारह
फितरत है ऐसी मेरी अगर तुमको इससे क्या ?
जब दिल मे अापके मेरी खातिर जगह नहीं
भटका करूं मैं चाहे जिधर तुमको इससे क्या?
✍ जितेंद्र सुकुमार ' साहिर '
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