ग़ज़ल
हर एक जगह एक सा मंजर नहीं होता
बाहर है जो अक्सर यहां अंदर नहीं होता
क़ातिल कई ऐसे भी तो होते हैं जहां में
हाथों में वो जिनके कोई खंजर नहीं होता
मजबूत अगर होते कहीं रिश्ते दिलों के
तो आज मकां मेरा यूं खंडहर नहीं होता
क़ीमत जो समझता यदि शबनम की जरा भी
तो प्यासा कभी कोई समंदर नहीं होता
जो हार के भी जीते हैं देखे हैं सिकंदर
बस जीतने वाला ही सिकंदर नहीं होता
✍ जितेंद्र सुकुमार ' साहिर '
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