ग़ज़ल
2122 1212 1212 22
कर दिया रिश्तों में जो ये दिवार कोरोना।
फिर भी होगा न कम कभी ये प्यार कोरोना।।
ठीक है अब नहीं मिलाते हाथ हम किसी से,
तोड़ सकता नहीं तू दिल के तार कोरोना।।
अब बरतने लगे हैं एहतियात सब के सब,
कर तू अपनी क़जा़ का इन्तजार कोरोना।
मज़हबी झगड़े अपनी अपनी जगहों पे है मगर
इक है दुश्मन से लड़ने हम भी यार कोरोना।।
तेरी कमजोरी की ख़बर सभी को हो रही है,
तेरी होगी बहुत ही जल्द हार कोरोना।।
क़ज़ा - मौत
एहतियात - सावधानी
✍जितेन्द्र सुकुमार साहिर
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