ग़ज़ल
अपना ग़म भी छुपाना पड़ता है
बेवजह मुस्कुराना पड़ता है
जीस्त जैसी भी हो मगर हँस के
बोझ इसका उठाना पड़ता है
रिश्ता दिल का यूँ ही नहीं जुड़ता
मिलने भी आना जाना पड़ता है
पेट बातों से ही नहीं भरता
दो निवाला खिलाना पड़ता है
आज का दौर है अलग सबसे
कौन क्या है बताना पड़ता है
दोस्ती का उसूल है साहिर
वादा करके निभाना पड़ता है
✍जितेंद्र सुकुमार 'साहिर '
शायर
*एकांत विला* पदमा तालाब के सामने
थाना पारा- राजिम
पोस्ट - राजिम, जिला -गरियाबंद (छत्तीसगढ़ )493885
व्हाट्सएप नंबर 90091 87981
9827345298
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