Monday, June 18, 2018

गजल

पास अपनों को बुलाना चाहता हूँ
दूरियाँ दिल की मिटाना चाहता हूँ

चाहे जिस रिश्ते में हो मेरी जां लेकिन
मैं तुम्हें अपना बनाना चाहता हूँ

प्यार ही बस प्यार हो अब जिसमें शामिल
ऐसी ही दुनिया बसाना चाहता हूँ

हो कोई तरकी़ब तो मुझको बताए
ग़म में भी मैं मुस्कुराना चाहता हूँ

झांक कर देखे मेरी आँखों मे कोई
सच क्या है मैं भी  बताना चाहता हूँ

जो नहीं लिक्खा गया किस्मत में मेरी
बस उसी को ही मैं पाना चाहता
हूँ
नाम हो सबकी जुबां पर मेरा ' साहिर  '
मौत भी  मैं शायराना  चाहता हूँ

✍जितेन्द्र सुकुमार ' साहिर '

Sunday, June 10, 2018

गजल

दूर है मुझसे खुशी क्यों
बिखरी सी है जिंदगी क्यों

चार दिन जीना है सबको
दिल में फिर ये दुश्मनी क्यों

रोशनी दी जिसने हमको
उसके घर में तीरगी क्यों

आदमी का खूं है पीता
अब यहां हर आदमी क्यों

आधुनिकता के भंवर में
हो गई गुम सादगी क्यों

✍जितेन्द्र सुकुमार 'साहिर'

Wednesday, June 6, 2018

गजल

अपने बालों को नोचते क्यों हो
इतना भी आप सोचते क्यों हो

जो नहीं हो सका तुम्हें हासिल
उन पलों को खरोचते क्यों हो

खुद को कहते हो आदमी फिर तुम
आदमीयत को रौंदते क्यों हो

मुफ़्त में किसको क्या मिला है बता
तुम मुकद्दर को कोसते क्यों हो

कुछ तो  ' साहिर ' ख़्याल रख पद की
मजलूमों को दबोचते क्यों हो

✍ जितेन्द्र सुकुमार  ' साहिर '

Monday, June 4, 2018

गजल

गजल
मुझको छोटा करके वो कैसे बड़ा हो जायेगा
रास्ते का कोई पत्थर क्या खुदा हो जायेगा

दहशतो के शोर में गुमसुम सी है अब ज़िन्दगी
जाने किस दिन मौत से यूं सामना हो जायेगा

खींच दूं हाथों में किस्मत की लकीरे मैं अगर
जो नहीं था कल मेरा, वो क्या मेरा  हो जायेगा

इक दफा भी  झाँक कर जो देख ले कोई अगर
मेरे दिल में क्या है ये सबको पता हो जायेगा

तेरा हो जाये कहीं दीदार पल भर भी हमें
दर्द भी मेरे लिये सचमुच दवा हो जायेगा
✍ जितेन्द्र सुकुमार 'साहिर'

Friday, June 1, 2018

ग़ज़ल

इसमें अब दो मत नहीं है
मेरे सर पर छत नहीं है

होश में रहता हूँ हरदम
मुझको कोई लत नहीं है

नाम लिक्खा है किसी का
यह तो मेरा ख़त नहीं है

वक़्त जब मुझको मिला है
तो तुम्हें फुर्सत नहीं है

सच कहे वो सबके आगे
इतनी भी हिम्मत नहीं है

पास अपने ग़म ही गम है
और कुछ दौलत नहीं है

✍जितेन्द्र सुकुमार  'साहिर'