पास अपनों को बुलाना चाहता हूँ
दूरियाँ दिल की मिटाना चाहता हूँ
चाहे जिस रिश्ते में हो मेरी जां लेकिन
मैं तुम्हें अपना बनाना चाहता हूँ
प्यार ही बस प्यार हो अब जिसमें शामिल
ऐसी ही दुनिया बसाना चाहता हूँ
हो कोई तरकी़ब तो मुझको बताए
ग़म में भी मैं मुस्कुराना चाहता हूँ
झांक कर देखे मेरी आँखों मे कोई
सच क्या है मैं भी बताना चाहता हूँ
जो नहीं लिक्खा गया किस्मत में मेरी
बस उसी को ही मैं पाना चाहता
हूँ
नाम हो सबकी जुबां पर मेरा ' साहिर '
मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ
✍जितेन्द्र सुकुमार ' साहिर '