गजल
मुझको छोटा करके वो कैसे बड़ा हो जायेगा
रास्ते का कोई पत्थर क्या खुदा हो जायेगा
दहशतो के शोर में गुमसुम सी है अब ज़िन्दगी
जाने किस दिन मौत से यूं सामना हो जायेगा
खींच दूं हाथों में किस्मत की लकीरे मैं अगर
जो नहीं था कल मेरा, वो क्या मेरा हो जायेगा
इक दफा भी झाँक कर जो देख ले कोई अगर
मेरे दिल में क्या है ये सबको पता हो जायेगा
तेरा हो जाये कहीं दीदार पल भर भी हमें
दर्द भी मेरे लिये सचमुच दवा हो जायेगा
✍ जितेन्द्र सुकुमार 'साहिर'
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