Monday, June 18, 2018

गजल

पास अपनों को बुलाना चाहता हूँ
दूरियाँ दिल की मिटाना चाहता हूँ

चाहे जिस रिश्ते में हो मेरी जां लेकिन
मैं तुम्हें अपना बनाना चाहता हूँ

प्यार ही बस प्यार हो अब जिसमें शामिल
ऐसी ही दुनिया बसाना चाहता हूँ

हो कोई तरकी़ब तो मुझको बताए
ग़म में भी मैं मुस्कुराना चाहता हूँ

झांक कर देखे मेरी आँखों मे कोई
सच क्या है मैं भी  बताना चाहता हूँ

जो नहीं लिक्खा गया किस्मत में मेरी
बस उसी को ही मैं पाना चाहता
हूँ
नाम हो सबकी जुबां पर मेरा ' साहिर  '
मौत भी  मैं शायराना  चाहता हूँ

✍जितेन्द्र सुकुमार ' साहिर '

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