अपने बालों को नोचते क्यों हो
इतना भी आप सोचते क्यों हो
जो नहीं हो सका तुम्हें हासिल
उन पलों को खरोचते क्यों हो
खुद को कहते हो आदमी फिर तुम
आदमीयत को रौंदते क्यों हो
मुफ़्त में किसको क्या मिला है बता
तुम मुकद्दर को कोसते क्यों हो
कुछ तो ' साहिर ' ख़्याल रख पद की
मजलूमों को दबोचते क्यों हो
✍ जितेन्द्र सुकुमार ' साहिर '
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