दूर है मुझसे खुशी क्यों
बिखरी सी है जिंदगी क्यों
चार दिन जीना है सबको
दिल में फिर ये दुश्मनी क्यों
रोशनी दी जिसने हमको
उसके घर में तीरगी क्यों
आदमी का खूं है पीता
अब यहां हर आदमी क्यों
आधुनिकता के भंवर में
हो गई गुम सादगी क्यों
✍जितेन्द्र सुकुमार 'साहिर'
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