Wednesday, October 24, 2018

ग़ज़ल

दूर मुझ से हर ख़ुशी है आज कल।
गुम लबों से तो हंसी है आज कल।

मेरी बच्ची दूर मत जाना कहीं
अच्छे लोगों की कमी है आज कल।

हरजगह है ख़ौफ़ पसरा मौत का।
दहशतों में ज़िन्दगी है आज कल।

क़स्र शाही के इलावा,हरतरफ़
तीरगी ही तीरगी है आज कल।

रंजो ग़म ने उन को भी घेरा है क्या।
उन की आँखो में नमी है आज कल।

जाने"साहिर"कब समझ होगी
तुम्हें।
वक़्त कितना क़ीमती है आज कल।

✍ जितेंद्र कुमार साहिर

Saturday, October 6, 2018

ग़ज़ल

बातों -बातों में तुम गिला न करो
खत्म यादों का सिलसिला न करो

दुनियां सोचेगी जरूर क्या से क्या
चुपके -चुपके यूं तुम मिला न करो

गर भला भी किसी का कर न सको
तो  किसी का  कभी बुरा न करो

मैं मुकद्दर को आजमा रहा हूँ
मेरे हक़ मे कोई दुआ न करो

नाम उसका हमेशा ले लेकर
दिल के जख़्मों को अब हरा न करो

कौन अपना है कौन बेगाना
चंद लम्हों में फैसला न करो।

                ✍ जितेंद्र सुकुमार 'साहिर'

Wednesday, August 15, 2018

ग़ज़ल

मेरी याद आये तो कहना
तुम्हें ग़म सताये तो कहना

सियासी है ये चाल समझो
ये वादा निभाये तो कहना

मुलाक़ात अपनी जगह है
कभी घर बुलाये तो कहना

यही हुस्न का काम है बस
न नींदे चुराये तो कहना

ग़मों से सना है ये जीवन
हमें ये हंसाये तो कहना

जितेन्द्र सुकुमार ' साहिर '

Monday, June 18, 2018

गजल

पास अपनों को बुलाना चाहता हूँ
दूरियाँ दिल की मिटाना चाहता हूँ

चाहे जिस रिश्ते में हो मेरी जां लेकिन
मैं तुम्हें अपना बनाना चाहता हूँ

प्यार ही बस प्यार हो अब जिसमें शामिल
ऐसी ही दुनिया बसाना चाहता हूँ

हो कोई तरकी़ब तो मुझको बताए
ग़म में भी मैं मुस्कुराना चाहता हूँ

झांक कर देखे मेरी आँखों मे कोई
सच क्या है मैं भी  बताना चाहता हूँ

जो नहीं लिक्खा गया किस्मत में मेरी
बस उसी को ही मैं पाना चाहता
हूँ
नाम हो सबकी जुबां पर मेरा ' साहिर  '
मौत भी  मैं शायराना  चाहता हूँ

✍जितेन्द्र सुकुमार ' साहिर '

Sunday, June 10, 2018

गजल

दूर है मुझसे खुशी क्यों
बिखरी सी है जिंदगी क्यों

चार दिन जीना है सबको
दिल में फिर ये दुश्मनी क्यों

रोशनी दी जिसने हमको
उसके घर में तीरगी क्यों

आदमी का खूं है पीता
अब यहां हर आदमी क्यों

आधुनिकता के भंवर में
हो गई गुम सादगी क्यों

✍जितेन्द्र सुकुमार 'साहिर'

Wednesday, June 6, 2018

गजल

अपने बालों को नोचते क्यों हो
इतना भी आप सोचते क्यों हो

जो नहीं हो सका तुम्हें हासिल
उन पलों को खरोचते क्यों हो

खुद को कहते हो आदमी फिर तुम
आदमीयत को रौंदते क्यों हो

मुफ़्त में किसको क्या मिला है बता
तुम मुकद्दर को कोसते क्यों हो

कुछ तो  ' साहिर ' ख़्याल रख पद की
मजलूमों को दबोचते क्यों हो

✍ जितेन्द्र सुकुमार  ' साहिर '

Monday, June 4, 2018

गजल

गजल
मुझको छोटा करके वो कैसे बड़ा हो जायेगा
रास्ते का कोई पत्थर क्या खुदा हो जायेगा

दहशतो के शोर में गुमसुम सी है अब ज़िन्दगी
जाने किस दिन मौत से यूं सामना हो जायेगा

खींच दूं हाथों में किस्मत की लकीरे मैं अगर
जो नहीं था कल मेरा, वो क्या मेरा  हो जायेगा

इक दफा भी  झाँक कर जो देख ले कोई अगर
मेरे दिल में क्या है ये सबको पता हो जायेगा

तेरा हो जाये कहीं दीदार पल भर भी हमें
दर्द भी मेरे लिये सचमुच दवा हो जायेगा
✍ जितेन्द्र सुकुमार 'साहिर'

Friday, June 1, 2018

ग़ज़ल

इसमें अब दो मत नहीं है
मेरे सर पर छत नहीं है

होश में रहता हूँ हरदम
मुझको कोई लत नहीं है

नाम लिक्खा है किसी का
यह तो मेरा ख़त नहीं है

वक़्त जब मुझको मिला है
तो तुम्हें फुर्सत नहीं है

सच कहे वो सबके आगे
इतनी भी हिम्मत नहीं है

पास अपने ग़म ही गम है
और कुछ दौलत नहीं है

✍जितेन्द्र सुकुमार  'साहिर'

Monday, May 28, 2018

गजल

ग़ज़ल
              
कदम से कदम तुम मिलाओ तो जाने
मेरा साथ हरदम निभाओ तो जाने
               
सरल है दरख़्तों को यूं काट देना
कहीं पेड़ तुम भी लगाओ तो जाने
                 
मुनासिब है माना खुशी में मचलना
जो हंस के हरेक  ग़म उठाओ तो जाने
              
तुम्हारा इशारा ही काफी नहीं है
लबों पे कोई बात लाओ तो जाने
                 
फ़कत मिलने का वादा करते हो तुम तो
हमें तुम कभी घर बुलाओ तो जाने
              
जो खुद को समझते हो शायर तो 'साहिर'
नया शेर कोई सुनाओ तो जाने

✍ जितेंद्र सुकुमार 'सहिर'

Tuesday, May 15, 2018

मुक्तक संग्रह

जितेन्द्र सुकुमार'साहिर' 

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छत्तीसगढ़ी गजल

जितेन्द्र सुकुमार'साहिर' की गजले-

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धुर्रा नान्हे कहिनी

जितेन्द्र सुकुमार'साहिर' की छत्तीसगढ़ी लघु कथा संग्रह

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